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भक्ति योग

यदि ब्रजेन्द्रनंदन श्यामसुन्दर की सेवा करने की अभिलाषा है, श्रीमती राधारानी की कृपा प्राप्त करने की इच्छा है तो रसिक भक्तोकी संगति में श्रीमदभागवत का आस्वादन करना चाहिये | ऐसे भक्त की संगति में आना श्रेष्ठ है, स्निग्ध है | इसे ही ‘साधुसंग’ कहते है |

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श्रीमती राधारानी

श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं कृष्ण है; परन्तु भाव उन्होंने राधारानी का लिया है l शरीर की काँति उनकी अपनी नहीं है l वे गौर वर्ण के हो गए है – ‘तप्त कंचन गौरांग’ l राधारानी के भाव और देह की कांति को स्वीकार कर चैतन्य महाप्रभु कृष्ण के प्रति अपने भाव को व्यक्त कर रहे है l

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हरिनाम दीक्षा

जिसकी कृपा से भगवान् में मति लगती है, भगवान् में प्रेम बढ़ता है,ऐसे गुरु के आदेशो को मानना चाहियेl भक्ति में बढ़ने के लिए शिष्य को व्यक्तिगत आदेश दिए जाते है l गुरु में हमेशा भगवत-बुद्धि होनी चाहिये क्योंकि भगवान् ही गुरु के रूप में जीव को भगवद्धाम में ले जाने के लिए आते हैं |

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श्री भीष्म स्तुति

भगवान् श्रीकृष्ण सबसे सुन्दर, परम विद्वान परम ऐश्वर्यवान, परम वत्सल हैं l वे अर्जुन का सारथि बने ,गिरिराज गोवर्धन उठाए, कालिय नाग के फनो पर नृत्य किये तथा दावानल को पिए l जिन्होंने भगवान् को अपनी आँखों से देखा है ,उनके साथ सम्बन्ध स्थापित किया है ,उनके साथ खेला है ,खाया है,युद्ध किया है, उनके उद्गार श्रीमद भागवतम में दिए गए हैं l भगवान् के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के लिए शास्त्रों को प्रमाणिक व्यक्ति से ही सुनना तथा पढ़ना चाहिये |

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गृहस्थों के सदाचार

“जो श्रीभगवान् का आश्रय लेकर रात दिन उनका नाम जपते रहेते हैं, उनके गुणों को गाते रहेते हैं, वही महामुनि हैं l ऐसे महामुनियो के संग में आना चाहिए l यह गृहस्थ जीवन की बहोत बड़ी सफलता मानी जाएगी |”

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पूतना-उद्धार

पूतना उद्धार लीला में भगवान् के कृपा की सीमा दिखायी गयी है l भगवान् सभी जीवो के प्रति स्नेह से भरे हुए हैं l वे कभी भी जीव के प्रति कभी भी उपेक्षा का भाव नहीं रखते l उनका स्वरुप ही ऐसा हे की वे सभी जीवो के परम प्रिय हैं और सबसे प्रेम करते हैं l जीव कितना भी पाप करे, अपराध करे; भगवान् उसे पराई दृष्टि से नहीं देखते l भगवान् की सभी लीलाओ में सबसे प्रेम करने की विशेषता प्रकट होती है l परन्तु भगवान् की एक ऐसी लीला हे जिसमे उनके इस स्वरुप का सम्पूर्ण प्रदर्शन हुआ हे – वह है पूतना उद्धार लीला |

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श्री गिरि-गोवर्धन

ब्रज में बहुत से पर्वत हैं,वे सब हरिदास हैं l उनमें भी लीलाएंहोती ही रहेती हैंl लेकिन गिरिराज जी हरिदासवर्य हैं, सबसे श्रेष्ठ हैं l इस प्रकार व्रज का एक-एक कण श्री कृष्ण की लीलासे संयुक्त हैं,सम्बंधित हैं l इसकी पुष्टि श्री गोपिकाओं के प्रवचन से हो रही है l यह है गिरिराज का सौभाग्य l जीव का भी बहोत बड़ा सौभाग्य है की वह भगवान् के लीला उपकरण को प्रणाम करता है, हाथों से छुता है, उनकी परिक्रमा करता है l इन्ही सब क्रियाओ द्वारा भगवान कृष्ण के प्रति भाव उत्पन्न होता है |

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