स्वरूप दामोदर को पत्र - बॉम्बे 10 जनवरी, 1976:
मैंने GBC के विचार हेतु भी सुझाव दिया है कि हमें भक्तों के लिए एक परीक्षा प्रणाली शुरू करनी है | कभी-कभी ऐसी आलोचना की जाती है कि हमारे भक्त पर्याप्त रूप से शिक्षित नहीं है, विशेषतः ब्राह्मण | निसन्देह द्वितीय दीक्षा परीक्षा उत्तीर्ण करने पर निर्भर नहीं करती है। किस प्रकार से उसने अपने जीवन को ढाला है - उसका जप, आरती में भाग लेना आदि, ये आवश्यक चीज़े हैं। फिर भी, ब्राह्मण का अर्थ है पंडित। इसलिए मैं परीक्षा प्रणाली का सुझाव दे रहा हूं। भक्ति-शास्त्री - भगवद-गीता, श्री ईशोपनिषद, भक्तिरसामृत सिन्धु, उपदेशामृत, और सभी छोटे पेपर बैक पर आधारित होगा। भक्ति-वैभव- उपरोक्त को मिलाकर श्रीमद्भागवतम के पहले छः स्कन्ध, भक्तिवेदांत- उपरोक्त को मिलाकर श्रीमद्भागवतम के ७-१२ स्कन्ध और भक्ति-सार्वभौम - उपरोक्त को मिलाकर चैतन्य-चरितामृत का अध्ययन।
ये उपाधियाँ बी.ए., एम.ए. और पीएच.डी. में प्रवेश के समान है| तो अब विचार करें कि इस संस्थान को कैसे संगठित किया जाए।

हमने उन भक्तों के लिए भक्ति शास्त्री पाठ्यक्रम तैयार किया है जो गंभीरता से कृष्ण भावनामृत का अभ्यास कर रहे हैं और श्रील प्रभुपाद की- भगवद-गीता यथारूप, भक्ति-रसामृत सिन्धु, उपदेशामृत और श्री ईशोपनिषद- इन पुस्तकों का व्यवस्थित रूप से अध्ययन करना चाहते हैं। यह पाठ्यक्रम आपको अपने शास्त्र ज्ञान और समझ को बढ़ाने में मदद करेगा। इस पाठ्यक्रम का उद्देश्य उन वैष्णवो को तैयार करने का है जो कृष्ण भावनामृत का अभ्यास करने में दृढ़ निश्चयी हैं और गौड़ीय वैष्णव सिद्धांतों को समाज तक पहुँचाने में समर्थ हैं। श्रील प्रभुपाद ने इस पाठ्यक्रम को सभी इस्कॉन भक्तों के लिए ब्राह्मणीय प्रशिक्षण और शिक्षा का एक अनिवार्य हिस्सा बताया है। योग्य छात्रों को इस्कॉन बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन से एक “भक्ति-शास्त्री” प्रमाणपत्र से सम्मानित किया जाएगा।

नामांकन के लिए आवश्यकताएँ: -

  • आपकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक होनी चाहिए।
  • भक्ति शास्त्री की डिग्री प्राप्त करने के लिए योग्य होने के लिए इस्कॉन बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन के दिशा-निर्देशों के अनुसार, छात्रों को हर रोज हरे कृष्ण महा-मंत्र की न्यूनतम 16 माला करनी चाहिए और चार नियमों का पालन करना चाहिए।
  • आपको एक सिफारिश पत्र प्रस्तुत करना होगा, एक इस्कॉन अधिकारी द्वारा जो आपको अच्छी तरह से जानता हो, आपके चरित्र, साधना, ब्राह्मणीय प्रवृत्तियों को प्रमाणित करता हो और आपका कम से कम पिछले 12 महीनों से भगवान चैतन्य महाप्रभु के प्रचार अभियान में अनुकूल योगदान होना चाहिए।
  • भक्ति शास्त्री डिग्री प्राप्त करने के लिए इस्कॉन बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन के नियमों के अनुसार, कोर्स में आपकी उपस्थिति कम से कम 75% होनी चाहिए।
  • बेहतर समझ के लिए हम विनम्रतापूर्वक आपसे निवेदन करते हैं कि यहाँ हमारे साथ इन चार पुस्तकों - भगवद गीता, भक्तिरसामृत सिन्धु, उपदेशामृत और श्री ईशोपनिषद का गहन अध्ययन करने से पहले, आप इन पुस्तकों को पढ़े और इस पाठ्यक्रम से पूरी तरह लाभान्वित हों।

नोट : आपको पंजीकरण फॉर्म और सिफारिश पत्र जमा करने के साथ ही सुविधा शुल्क के भुगतान के बाद ही पंजीकृत माना जाएगा। (सिफारिश पत्र नीचे दिए गए प्रारूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए और यह पंजीकरण प्रपत्र जमा करने और भुगतान करने के बाद iskconbmv@gmail.com पर ईमेल के माध्यम से भेजा जा सकता है)

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कोर्स सुविधा शुल्क: रु 5000/-

 

भगवद गीता में कृष्ण स्वयं, भौतिक संसार के बद्ध जीवात्माएँ को, विशेष रूप से वे, जो आधुनिक युग में आध्यात्मिक रूप से अयोग्य हैं, उन्हें संबोधित करते हैं, और बताते हैं कि उन्हें क्या सुनने की आवश्यकता है। भगवान सरल शब्दों में कहते है कि उन्हें क्यों जीवन की शारीरिक अवधारणा में नहीं उलझना चाहिए, और कैसे क्रमशः वे मुक्त हो सकते हैं और अपने वास्तविक जीवन को पुनः प्राप्त कर सकते हैं। जो कोई अभी भी बद्ध है उन्हें इन मुक्ति के विज्ञान संबंधित निर्देशों को सुनकर प्रसन्न होना चाहिए। क्योंकि यह एक ऐसे व्यक्ति द्वारा बोली गई है जो इन निर्देशों को सिखाने में सबसे सक्षम है, और जो कोई अल्प श्रद्धा से भी सुनता है उसके जीवन को परिवर्तित करने में भगवान पूरे प्रबल है | जो लोग पहले से ही मुक्त हैं, वे भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के इन महत्वपूर्ण विषयों पर दिव्य वचनों का आस्वादन करते है और अपने प्रचार के दौरान उन्हें नियमित रूप से उद्धृत करते हैं। श्रील प्रभुपाद कहते है कि हर भक्त जो अच्छा प्रचारक बनना चाहता है, उसे भगवद्गीता में पारंगत होना चाहिए।

चूँकि हमारी प्रेम करने की आधारभूत इच्छा को संतुष्ट किये बिना हम कभी प्रसन्न नहीं हो सकते, इसी कारण से भक्ति-रसामृत-सिंधु भक्ति की सभी जटिलताओं का वर्णन करता है| यह एक संक्षिप्त अध्ययन है भक्ति-रसामृत सिन्धु का, जो रूप गोस्वामी द्वारा लिखित वैष्णव साहित्य है | इसमे व्यवस्थित रूप से भक्ति के विभिन्न स्तरों का विश्लेषण किया गया है जिसका फल है भगवत प्रेम |

रूप गोस्वामी एक रूपक का उपयोग करते है जिसमे भगवान के साथ भक्तिमय सम्बन्ध की सागर (सिंधु) के साथ तुलना करते है | पुस्तक का शीर्षक बताता है कि प्रेममय सम्बन्ध मधुर अमृत की तरह आनंददायक और सागर की तरह गहरा है । हालाँकि, भक्ति वास्तव में केवल परम प्रिय श्रीकृष्ण के लिए है।

श्रील प्रभुपाद ने कृष्ण भावनामृत की प्रथाओं और आदर्शों की आवश्यक समझ को दर्शाने के लिए और पश्चिमी देशों को भक्ति के सिद्धांतों की सुंदरता से परिचित कराने के लिए यह संक्षिप्त विवरण दिया है।

जो लोग आध्यात्मिक रूप से प्यासे है, वे भक्तिरसामृत सिन्धु के असीमित भंडार से अमृत पीकर कृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध को विकसित कर सकते हैं | जी भर के पियें।

उपदेशामृत में कैसे गुरु का चयन करना, योग का अभ्यास कैसे करना, यहां तक कि कहां रहना है, इन विषयों पर आवश्यक आध्यात्मिक शिक्षाओं के ग्यारह पाठ सम्मिलित हैं - यह सब आपको इस अमूल्य पुस्तक में मिलेगा। यह मूल रूप से संस्कृत में लिखित है, रूप गोस्वामी के द्वारा, जो मध्यकालीन भारत के सबसे बडे अध्यात्मिक प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। उपदेशामृत, आध्यात्मिक सिद्धि के मार्ग पर सभी साधकों के लिए ज्ञान की चाबी है।

108 उपनिषदों को सभी वेदों का सार माना जाता है, और श्री ईशोपनिषद उनमें सबसे सर्वप्रथम है। इन अठारह ज्ञानवर्धक मन्त्रों में सभी ज्ञान के शुद्ध सार की खोज करें।

हजारों वर्षों से, आध्यात्मिक खोज में लगे लोगों ने इस रहस्यमय, गहन दार्शनिक उपनिषदों से परामर्श लिया है। जैसा कि नाम इंगित करता है (उप-पास; नी-निचे; षद-बैठना), व्यक्ति को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक गुरु के पास बैठने की सलाह दी जाती है। क्या सीखने के लिए? यह उपनिषद का नाम संकेत देता है: ईश का अर्थ है "सर्वोच्च नियंत्रक।" आइए हम सर्वोच्च नियंत्रक (भगवान) के बारे में जानने के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शक के पास बैठें।

 

संपर्क विवरण :-

पता : इस्कॉन भागवत महाविद्यालय, 344, श्री राधा गोल्फ, अन्योर, बड़ी परिक्रमा मार्ग, गोवर्धन, जिला - मथुरा, उत्तर प्रदेश 281502

किसी भी प्रश्न के लिए हमें iskconbmv@gmail.com पर लिखे या संपर्क करे - वंशीधारी गौरी देवी दासी - +91 95280 06565

अध्यापक

कमल लोचन दास

प्राणेश्वर दास

रुक्मिणी कृष्ण दास

केशव मुरारी दास

सुन्दर गोपाल दास

धीर प्रशांत दास

प्रेमसिन्धु गौरांग दास

मधुसूदन विष्णु दास

जय दामोदर दास